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काव्य कुंज

काव्य कुंज

शब्दों के नए आकाश में, उभरते कलमकारों की भावनाओं का जीवंत संसार।

गौरव मिश्रा (प्रवर)
प्रेम से डोर तक

वक्त के सांचे में ढल नही पाये साथ चलना था चल नही पाये कोशिशें लाख हुई सुलझाने की निकाल कोई भी हल नही पाए...

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अमन दुबे
प्रेम की पराकाष्ठा

किसी की सिसकियां थमीं किसी ने आसूं पोछे ...

पूरा पढ़ें दादी की रोटी

स्त्रियों ने रोटी बनाई और रखा खुद की पहुंच से दूर । ...

पूरा पढ़ें शब्द

शब्दों पर पकड़ बनाने की कोशिश मे...

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असंग
कविता का शीर्षक

कविता की पंक्तियाँ यहाँ...

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प्रज्ञा (वत्स)
पेज पर जाएं मैं और परमपिता परमेश्वर

मैं और आप बहुत दूर हैं ...

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