प्रेम से डोर तक

गौरव मिश्रा (प्रवर)

प्रेम से डोर तक

9 जून 2026

वक्त के सांचे में ढल नहीं पाये
साथ चलना था, चल नहीं पाये
कोशिशें लाख हुईं सुलझाने की
निकाल कोई भी हल नहीं पाये

डोरियां खुलने लगी हैं धागों की
डालियां टूटने लगी हैं आंधी में बागों की
मुक्त हो रहा है शहर जैसे
मंजिलें भरभरा गईं यादों की

मुकाम पाये तो खुश रहें यारा
हाल होगा जो भी हमारा
उसके हिस्से में गम नहीं आयें
उसको मिलता रहे अपनों का सहारा

हम ने चाहा जितना, रिश्ते उतना
संभल नहीं पाये
रात जागी है अगर उसने, तो
सो हम भी कल नहीं पाये
निकाल कोई भी हल नहीं पाये

© गौरव मिश्रा (प्रवर) 9 जून 2026@(कव्य कुंज, आलोक पत्रिका)