जीवन प्रवाह

आदर्श कुमार शुक्ला

जीवन प्रवाह

30 जून 2026

धूप की ढलती लकीरें, शाम का ठहराव है,
समय की गति में ही, अब मेरा पड़ाव है।
ना कोई शिकवा गिला , ना कोई फरियाद है,
बदलते हुए मौसम की, बस एक याद है।
​पतझड़ और वसंत का, अपना ही क्रम है,
चलना ही मेरी नियति है, न कोई विश्राम है।
शांत मन, स्थिर पग, और सीमित सा सफर है,
जो भी है, जैसा भी है, बस जीवन इसीका नाम है।

©आदर्श कुमार शुक्ला 30 जून 2026@(कव्य कुंज, आलोक पत्रिका)