नभ-दीप: एक अश्रुपूर्ण विदाई
स्मृति शेष: डॉ. बशीर बद्र (1935 - 2026)
आज साहित्य का आकाश कुछ धुंधला सा है। उर्दू गजल को आम आदमी की धड़कन बनाने वाले, सादगी को फलसफा और दर्द को दवा में बदलने वाले डॉ. बशीर बद्र साहब आज हमसे भौतिक रूप से विदा हो गए हैं।
वे महज एक शायर नहीं थे, वे एक ऐसा अहसास थे जिसने शब्दों को मसीहाई दी। उन्होंने अपनी शायरी के माध्यम से जिंदगी की उन तल्ख सच्चाइयों को उजागर किया, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते थे। उन्होंने कहा था— “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।” और आज, वे खुद उस शाम के राही बन गए।
डिमेंशिया की लंबी और पीड़ादायक लड़ाई ने भले ही उनसे उनकी स्मृतियाँ छीन ली थीं, लेकिन उनका रचा हुआ साहित्य हमें उनकी यादों का वह उजाला सौंप गया है, जो सदियों तक मध्यम नहीं पड़ेगा। उनका लेखन हमें सिखाता है कि कैसे मुश्किल हालातों में भी गरिमा के साथ जिया जाता है।
उनकी कालजयी रचनाएँ: श्रद्धांजलि के कुछ फूल
"उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।"
"लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।"
"अजीब ज़ात हूँ मैं भी, कि अपनी महफिल में,
किसी के आने का रास्ता तलाश करता हूँ।"
"दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।"